पेंचर पहुना
कल्हिए रमेसर काका एगो टा ली के परची दे गइल रहुअन। ऊँखी छिलवावे के रहुए ए से आजु सबेरवें ऊँखी छिलवावे खातिर पूरा गाँव की लोग के चला के हमहुँ ऊँखियारी में चलि गउँवीं। रउआँ सभें त जानते बानी की जेकरा एक्कोगो चउवा बा आ चाहें पलानी-ओलानी छावे के बा उ जाड़ा-पल्ला थोड़े देखेला। केतनो जाड़ा पड़त रहो लोग-लइका कंबल-ओंबल ओढ़ि के चाहें गाँती-ओंती बाँधि के ऊँखी छिले खातिर भिनसहरवे ऊँखिआरी की ओर चलि देला। गाई-गोरू के खाए खातिर गेड़ त गेड़ कुछ लोग पलानी-ओलानी छावे खातिर पतइओ बाँधि ले आवे ला। अरे एतना ना आजकल त लवना के काम भी ए पतई से चलि जाला अउर ए जाड़ा-पल्ला में तापहुँ की कामे आवेला। केतना हँसी-ठिठोली होला ऊँखी छिलले में। आनंद ही आनंद रहेला। खूब ऊँखियो चीभे के मिलेला अउर सबेरहीं-सबेरहीं पूरा गाँव का अगल-बगल की गाँवन के समाचार भी इहाँ मिली जाला। हँ त भ उ वे इ की ऊँखी की खेत्ते में से हम छिलल ऊँखी ढोवा के सेक्टर पर टाली पर लदवावत रहुवीं तवलेकहीं का देखतानी की ओही जाड़ा-पल्ला में पेंचर पहुना साइकिल डुगरावत चलल बाने । अरे पें...