चोरवा गाँव
चोरवा गाँव...जी हाँ...अगर हम कहीं की 25-30 बरिस पहिले हमरी गाँव के जवार-पथार के लोग
चोरवा गाँव कहि के संबोधित करत रहल ह त एम्मे कवनो बेइजती के बात त नइखे। ...अरे भाई ई चोरी कम लंठई अधिका रहल ह। काहेंकि केहू के मरिचा टुड़ लेहल, पलानी पर से चुपके से घेवड़ा, लउकी, कोहड़ा टूड़ लेहल, मवेसियन खातिर हरहरी काटि ले आइल....बाँस
आदि काटि लेहल, मटर उखाड़ि लेहल, छोट-मोट पलानि उठा के समति में डालि देहल, इ सब चोरी के काम थोड़े ह?ए के त लोग लंठई
मानत रहल ह। पर लंठई के भी एगो सीमा होखे के चाहीं काहें की कबो-कबो खेल-खेल में
भी बखेड़ा हो जाला त लंठई में त कपरफोड़अउल के नउबत आ जाला। पर जवन भी होखे हमरा त
दुख ए बाति के बा की इ छोट-मोट लंठई की आधार पर का कवनो गाँव के चोरवा गाँव के
संग्या देहल ठीक बा? पता ना काहें हमरी गाँव के बुढ़-पुरनिया
जब इ काम करत रहने हँ त जवार-पथार की लोग के छाती फाटत रहल ह अउर उ लोग हमरी गाँव
के गोपलापुर (गोपालपुर) ना कहि के चोरवा गाँव कहत रहल ह लोग।
भूला-भटकि के अगर रात-बिरात हमरी गाँव के लोग कवनो गाँव में पनाह लेहल चाही अउर ओ गाँव वालन के पता चलि जाई की इ मनई गोपलापुर के ह त कहिहेंसन की चोरवा गाँव के ह, पनाह देबSजा त भिनसहरे उठि के जवने पाई, काँखे में दबाई अउर अपनी गाँव की ओर परा जाई। कुछु न पाई त जवने बिछवना पर सुतल रही ओही के गुमेटी के फरार हो
जाई। हँ इहो सही बात रहल ह एक बेर का भइल की खमेसर बाबा भंइस किने गइल रहने अउर
राति भइला पर एगो गाँव में टिक्कि गइनें, सबेरे-सबेरे ओ घर से लोटा ले के
डोल-डाल होखे निकलने अउर उ फुलहा लोटा लेहले गाँवे चलि अइने।
धीरे-धीरे चोरवा
गाँव की नाव से जब हमार गाँव दु-चारि का जब कई जिलन में, अरे इहाँ तक की
बिहार की कुछ हिस्सन में परसिद्ध हो गइल त हमरी गाँव की लोग के बहुत परेसानी होखे
लागल। रात-बिरात कहीं टिकल चाहे लोग त चोरवा गाँव की नाव पर भगा देहल जाव लोग। अब
हमरी गाँव के लोग एगो नया रास्ता अपनवले रहे अउर अगर कबो राति-विराती कवनो दूसरे गाँव
में टिके के परी जा त अब हमरी गाँव के लोग, अपनी गाँव के नाव ना बता के पास की कवनो गाँव के नाव
बता दे, कीफलाँ गाँव के रहे वाला हईं, पास की गाँव के
नाव ए से बतावे की अगर ओ गाँव की बारे में केहू कुछ जानल चाहे तो बेझिझक बता देहल
जाव, ना त गोपलापुर कहते ओ गाँव के लोग कहे की ए बाबू डगर ध ल, हमरी गाँव में टिकले के ताक नइखे, केकरा जांगर बा की रातिभर जागि के तहके
अगोरी?
एक बेर हमरी गाँव के एक जाने यादवजी अपनी एगो रिस्तेदारी से पलझल रहने। रास्ता
में एगो गाँव में नाच होत रहे। उ लगने नाच देखे। एतने में ओ गाँव की कुछ लुहेड़न
कुल के पता चलि गइल की इ त चोरवा गाँव के हउअन। अब त ओ गाँव के लुहेड़ा अपनी
लुहेड़ई के लोहा मनवावे खातिर यादवजी के लठिए चोरा लेहने सन। यादवजी बहुते परेसान
भइने अउर ओ गाँव में सबकी घरे जा-जा के चिरउरी कइने की भाई हमार लाठी वापस क द जा पर उनकरी बात पर केहू धेयान ना दे अउर त अउर उनकर हँसियो उड़ावे लोग। अंत
में यादवजी ओ गाँव की एक जाने बड़कवा की दुआरे पर जाके बइठ गइने अउर ओ घर की मालिक से कहने की हमार लाठी दिउआ देहल जाव ना त एकर
परिनाम बहुत भयंकर होई अउर इ पूरा गाँव सांसत में परि जाई। पर उहाँ से भी यादवजी
के दुरदुरा देहल गइल।अब यादवजी बिना आपन लाठी (इज्जत) लेहले गाँवे कवनेगाँ आ
सकेने, मोछी के सवाल रहे?
ओई दिन रातिखान यादवजी ओ गाँव की बहरी जेतना भी पूजवटि लगावल रहे, सब फूँकी के उहवें एगो पीपरे के पेड़ रहे ओही पर पुलईं चढ़ि के बइठ गइने। अरे इ का पूरा गाँव में हड़कंप मचि गइल, उ लोग अंदजो लगावल की इ ओही अहिरे के काम ह, अब ओ के खोजि निकालल जाव अउर मारल भी जाव अउर इहो तय भइल की अब हर हालत में ओकर लाठी देबे के नइखे। यादवजी के पूरा गाँव के लोग खोजि देहल पर ना पावल लोग। दूसरा राति ओ गाँव की केतने जाने के गाइ-बैल, भंइस के खोली के यादवजी हाँकि देहने। गाँवभर फेनु परेसान पर केतनो खोजे लोग यादवजी के पावे लोग नाहीं। यादव जी इ कुल काम कइले की बाद पीपरे पर आ के बइठि जाँ अउर भिनसहरा अपनी रिस्तेदारी में चलि जाँ। फेनु रातिखान ओ गाँव में चलि आवें। हर रात कुछ न कुछ हंगामा ओ गाँव में होखे पर ओ गाँववालन के यादवजी भेंटा ना। 4-5 दिन की बाद अंत में एक रात आजिज हो के ओ गाँव के लोग ओ ही पिपरे की नीचे बतिआवल की लाठी की साथे-साथे अब एगो पियरी धोतियो वापस क के चोरवा गाँव की ओ यादव के गोर ध लेहल जाव ना त पता ना अबहिन केतना उतपात मचाई। इस सब बाति यादवजी ओ पीपरे पर बइठ के सुनत रहने, उतरि के नीचे अइने, केहू के हिम्मत ना परल की उनसे आँखि मिलावो। सबेरे-सबेरे खिया-पिया एगो पियरी धोती अउर लउर (लाठी) दे के ऊ लोग यादवजी के बिदाई कइल। यादवजी कहने की जबले हमार लाठी वापस ना मिलित तबले हम गाँवे कत्तई ना जइतीं।
ओई दिन रातिखान यादवजी ओ गाँव की बहरी जेतना भी पूजवटि लगावल रहे, सब फूँकी के उहवें एगो पीपरे के पेड़ रहे ओही पर पुलईं चढ़ि के बइठ गइने। अरे इ का पूरा गाँव में हड़कंप मचि गइल, उ लोग अंदजो लगावल की इ ओही अहिरे के काम ह, अब ओ के खोजि निकालल जाव अउर मारल भी जाव अउर इहो तय भइल की अब हर हालत में ओकर लाठी देबे के नइखे। यादवजी के पूरा गाँव के लोग खोजि देहल पर ना पावल लोग। दूसरा राति ओ गाँव की केतने जाने के गाइ-बैल, भंइस के खोली के यादवजी हाँकि देहने। गाँवभर फेनु परेसान पर केतनो खोजे लोग यादवजी के पावे लोग नाहीं। यादव जी इ कुल काम कइले की बाद पीपरे पर आ के बइठि जाँ अउर भिनसहरा अपनी रिस्तेदारी में चलि जाँ। फेनु रातिखान ओ गाँव में चलि आवें। हर रात कुछ न कुछ हंगामा ओ गाँव में होखे पर ओ गाँववालन के यादवजी भेंटा ना। 4-5 दिन की बाद अंत में एक रात आजिज हो के ओ गाँव के लोग ओ ही पिपरे की नीचे बतिआवल की लाठी की साथे-साथे अब एगो पियरी धोतियो वापस क के चोरवा गाँव की ओ यादव के गोर ध लेहल जाव ना त पता ना अबहिन केतना उतपात मचाई। इस सब बाति यादवजी ओ पीपरे पर बइठ के सुनत रहने, उतरि के नीचे अइने, केहू के हिम्मत ना परल की उनसे आँखि मिलावो। सबेरे-सबेरे खिया-पिया एगो पियरी धोती अउर लउर (लाठी) दे के ऊ लोग यादवजी के बिदाई कइल। यादवजी कहने की जबले हमार लाठी वापस ना मिलित तबले हम गाँवे कत्तई ना जइतीं।
अब एगो चुहुलबुल
खिस्सा सुनीं। ओ बेरा 12-14 बरिस में बिआह हो जा। माने दुलहो लरिकाइए
बुद्धि के रहे लोग। अपनी दिमाग से कम, बरतिया चाहें हित-नात आ चाहें घर के लोग जवन कहे, ओही नुसार ओ लोगन के काम करे के परे।
खीरखउकी की पहिलहीं बर महोदय के सीखा देहल जाव की खीरखउकी में का माँगे के बा, कवनेगाँ कोहनाए के बा। फेर जब केहू बराती
में से फूफा, मउसा, काका,बाबूजी चाहें केहु अउर जा के मनाई तब्बो पहिलहीं बेर में खाइल सुरु नइखे क देबे के, 2-3 बेर कहले की बादे खीर खाए के बा। अउर हाँ
अगर लइका (बर) बिना कोहनइले खाइओ लेव त ओ के सुभ ना मानल जाव, परंपरा बा भाई खिरखउकी में रिसिअइले के।
खैर हम अपनी बात पर आवतानी। ओ बेरा बिआह-सादी में मारि भइल आम बाति रहे। अउर त अउर कुछ लोग त एइसने होला की जहाँ ना बजड़े के रही उहवों बजड़ा दी। त भइल ई की बभनइया (उत्तर टोला) में बरात आइल रहे। खीर खउकी की समय लइका के केतनो मनावनि भइल पर उ खीर खाए के तइयारे ना होखे। रेडियो, घड़ी अउर साइकिल के ओकर माँग रहे। रेडियो, घड़ी दिआइल रहे। अंत में घराती में से केहू बराती में पहुँचल अउर कहल की भाई केहू चलि के लइका के मना देव, खीर नइखे खात। ए ही पर काहा-सुनी होखे लागल। घराती अउर बराती आमने-सामने हो गइल लोग। लइका के भी बराती में बिना खीर खइले बोला लेहल गइल।
घरा-धरउअल भी सुरु हो गइल। अंत में बराती तीरछे भागे-पराए लगने कुल। कवनो मवनहिया की ओर भागल त कवनो धोबरहिया की ओर। लइका के फूफा लइका के कोरा में उठा के हाथी पर चढ़ा के भगने। हाथी लइका के लेके मटिरहिया पर पहुँचल रहे। तवलेकहीं के हू कहल की बराती भले भागि जा सन पर लइका के त पकड़ि के ले आव जा ना त बाद में पता ना का होई। एतना सुनते रमेसर बाबा कस के पगड़ी बंधने अउर लउर उठवने। लउर उठा के उ तेज कदम से मटिरहिया की ओर भगने। हाथी की लगे पहुँचि के उ महाउत से कहने की हाथी वापस ले चल। महाउत तइयार ना भइल अउर गरजि के कहलसि की आगे से हटि जा ना त हाथी के तोहरी ऊपरे चढ़ा देइबी। इहे कहि के उ हाथि के भड़कवलि,आही हो दादा, अब त हाथी रमेसर बाबा की ओर तेज गति से रिसिया के बढ़ल। पहिले त रमेसर बाबा चारि कदम पीछे हटने अउर ओकरी बाद संभारि के हइंच लाठी हाथी की अगिला गोरन पर मरने। जय हो..जय हो, लाठी लगते हाथी चोंकरि के बइठ गइल। ओकरी बाद रमेसर बाबा महाउत के एक लाठी,लइका की फूफा के धीरहीं से एक लाठी लगवने अउर लइका के कांखे में दाबि के गाँव में आ गइने।खैर बाद में सादी-बिआह सब निमने-निमने बीत गइल।
खैर हम अपनी बात पर आवतानी। ओ बेरा बिआह-सादी में मारि भइल आम बाति रहे। अउर त अउर कुछ लोग त एइसने होला की जहाँ ना बजड़े के रही उहवों बजड़ा दी। त भइल ई की बभनइया (उत्तर टोला) में बरात आइल रहे। खीर खउकी की समय लइका के केतनो मनावनि भइल पर उ खीर खाए के तइयारे ना होखे। रेडियो, घड़ी अउर साइकिल के ओकर माँग रहे। रेडियो, घड़ी दिआइल रहे। अंत में घराती में से केहू बराती में पहुँचल अउर कहल की भाई केहू चलि के लइका के मना देव, खीर नइखे खात। ए ही पर काहा-सुनी होखे लागल। घराती अउर बराती आमने-सामने हो गइल लोग। लइका के भी बराती में बिना खीर खइले बोला लेहल गइल।
घरा-धरउअल भी सुरु हो गइल। अंत में बराती तीरछे भागे-पराए लगने कुल। कवनो मवनहिया की ओर भागल त कवनो धोबरहिया की ओर। लइका के फूफा लइका के कोरा में उठा के हाथी पर चढ़ा के भगने। हाथी लइका के लेके मटिरहिया पर पहुँचल रहे। तवलेकहीं के हू कहल की बराती भले भागि जा सन पर लइका के त पकड़ि के ले आव जा ना त बाद में पता ना का होई। एतना सुनते रमेसर बाबा कस के पगड़ी बंधने अउर लउर उठवने। लउर उठा के उ तेज कदम से मटिरहिया की ओर भगने। हाथी की लगे पहुँचि के उ महाउत से कहने की हाथी वापस ले चल। महाउत तइयार ना भइल अउर गरजि के कहलसि की आगे से हटि जा ना त हाथी के तोहरी ऊपरे चढ़ा देइबी। इहे कहि के उ हाथि के भड़कवलि,आही हो दादा, अब त हाथी रमेसर बाबा की ओर तेज गति से रिसिया के बढ़ल। पहिले त रमेसर बाबा चारि कदम पीछे हटने अउर ओकरी बाद संभारि के हइंच लाठी हाथी की अगिला गोरन पर मरने। जय हो..जय हो, लाठी लगते हाथी चोंकरि के बइठ गइल। ओकरी बाद रमेसर बाबा महाउत के एक लाठी,लइका की फूफा के धीरहीं से एक लाठी लगवने अउर लइका के कांखे में दाबि के गाँव में आ गइने।खैर बाद में सादी-बिआह सब निमने-निमने बीत गइल।
ओ बेरा के मनई
भले रुख-सूख खा पर केतना बरियार होखे एकर एगो अउर खिस्सा सुनीं। महेसर बाबा अउर रमेसर बाबा दुनु जाने ओ
बेरा गबड़ु जवान रहे लोग। ओ साल हमरी गाँवे लेहना के बहुते परेसानी रहे। ना भूसे
रहे ना पुअरे। आखिर कब ले दूसरे की खेत्ते में से मटर-ओटर उखाड़ि के, गेड़ चोरा के टुरि के अउर दु-चार बोझा
पुअरा-पेथारी चोरवले से काम चलित। महेसर बाबा एक राति बरिआई से रमेसरो बाबा
के नाच देखे खातिर एगो दूर की गाँव में लिआ गइने। नाच वाला सोरठी बिरजाभार के पाठ करत रहने सन। भिनसहरा जब नाच खूब जमकल
त महेसर बाबा रमेसर बाबा के ले के पहिले ओ गाँव की बहरे अइने। गाँव की बहरे एगो गढ़ही किनारे कईगो पुजवटि लागल रहनीसन। महेसर बाबा धीरे से रमेसर बाबा की कान में
फुसफुसइने, जबन हउ तनि मजगर पुजवटि लउकता ओमें पेसु
लाठी। एकरी बाद फटाफट दुनु भाई एगो पुजवटि में दुनु लाठि पेस के ओ के डोली की तरे
कांधे पर उठा के गाँव की ओर तेज कदम से बढ़े लागल लोग।
6 बजे सबेरे ले उ लोग अपनी गाँव की सरहद में पहुँचि गइल लोग। दुआरे पर पहुँचि के रमेसर बाबा पुछने की ए भाई पुजवटि कहाँ धराव त महेसर बाबा कहने दुर बुरबक, परती में चाहें गाँव की बहरा धराई त गंउवेवाला खिआ दिहेसन। एसे अच्छा बा की दुअरवे पर ध देहल जाव।
एकरी बाद उ लोग कांधे पर से जइसे पुजवटि उतारे लागल लोग, पुजवटि अगोरना (मतलब पुजवटिया वाला जवन ओही पुजवटिया की ऊपर सुति के अगोरत रहे) पूजवटिए की ऊपरे से हड़बड़ा के बोलल, ए भाईलोग, धीरे से पुजवटिया पटकिहS जा। ना त हमरा घाव लागि जाई। पुजवटि उतरइले की बाद महेसर बाबा ओ पुजवटिवाला से कहने की दु मरदे, अगर पुजवटि उठवले की समय ही कहले रहतS त तोहार पुजवटि ना न ले आइल रहतीं जा। एपर पुजवटिया वाला कहलसि की भाई लोगीं, हमरा लागल की गमइले रहि गइल ठीक बा, कहीं एइसन ना होखे की बोलीं त तोह लोगन मरबो करजा।।
6 बजे सबेरे ले उ लोग अपनी गाँव की सरहद में पहुँचि गइल लोग। दुआरे पर पहुँचि के रमेसर बाबा पुछने की ए भाई पुजवटि कहाँ धराव त महेसर बाबा कहने दुर बुरबक, परती में चाहें गाँव की बहरा धराई त गंउवेवाला खिआ दिहेसन। एसे अच्छा बा की दुअरवे पर ध देहल जाव।
एकरी बाद उ लोग कांधे पर से जइसे पुजवटि उतारे लागल लोग, पुजवटि अगोरना (मतलब पुजवटिया वाला जवन ओही पुजवटिया की ऊपर सुति के अगोरत रहे) पूजवटिए की ऊपरे से हड़बड़ा के बोलल, ए भाईलोग, धीरे से पुजवटिया पटकिहS जा। ना त हमरा घाव लागि जाई। पुजवटि उतरइले की बाद महेसर बाबा ओ पुजवटिवाला से कहने की दु मरदे, अगर पुजवटि उठवले की समय ही कहले रहतS त तोहार पुजवटि ना न ले आइल रहतीं जा। एपर पुजवटिया वाला कहलसि की भाई लोगीं, हमरा लागल की गमइले रहि गइल ठीक बा, कहीं एइसन ना होखे की बोलीं त तोह लोगन मरबो करजा।।
चलत-चलत तनि
कइले-पियले की लीला के भी बखान हो जाव। ओ बेरा दही (सजावे मिल जा त का पूछे के अउर उ हो अहरा पर के नदिया में
जमावल)-चिउरा-चीनी (चीनी ना रहले पर गुड़ चाहें खाड़) पंडीजी लोगन के सबसे प्रिय
आहार रहे। एगो कहाउतो बा, "बाभन जाति, अँधरिया रात, एक मुठी चिउरा पर दउड़ल जात।।"
साथे-साथे इहो कहल बा की एक बुलावे, चउदह धावे (इहो कहाउत बाबा लोगन की चुरा (भोजन) परेम पर ही बनल बा)। ओ बेरा
बाबा लोगन की लगे भले कुछ रहे चाहें ना पर हाथे में लोटा अउर कांधे पर चमकत
जनेऊ जरूर रहे। धोती लपेटले, कांधे पर गमछा लटकवले केतने दूर खाए खातिर चलि जाव लोग।
अब देखीं हमरी गाँव की एक जाने बाबा के लंठई, ए के हम मुर्खता ए से ना कहबि की ओ बेरा उहाँ की नजर में जवन ठीक लागल उहाँ का उहे कइनी। भइल इ की पास की गाँव के एक जाने पंडीजी एक दिन हमरी गाँव की एक जाने पाणेजी के दही-चुरा पर आमंत्रित कइनीं। हमरी गाँव के पाणेजी दबा के खइनी अउर खा के अघा गइनी। फेन रातिखान भी दबवनी अउर उहवें रातिखान दबा के नींद लेहनी। सबेरे-सबेरे नास्ता में फेन से दही-चुरा मिलल अउर लिट्टी-चोखा लागे लागल। लिट्टी चोखा खइले की बाद हमरी गाँव के पाणेजी ओ पंडीजी से कहनी की भाई तोहार एतना सेवा वेयर्थ ना जाई, चलSदेउरियां। आई हो दादा। पंडी जी अउर पाणेजी देउरियां गइल लोग अउर हमरी इहाँ के पाणेजी दही-चुरा की बदले 110 बिगहा ओ पंडी जी की नावे क देहनी। नावे क देहले की बादो लगभग 25-30 साल ले त उ जमीन हमरी गाँव के लोग जोते-बोवे पर अब ओ जमीन पर दही-चुरा खिआवे वाला पंडी के खानदान सोना बोवता अउर सोनवे काटता। एक मुट्ठी चिउरा अउर जीवन भर सोना उपजावे के साधन।
अब देखीं हमरी गाँव की एक जाने बाबा के लंठई, ए के हम मुर्खता ए से ना कहबि की ओ बेरा उहाँ की नजर में जवन ठीक लागल उहाँ का उहे कइनी। भइल इ की पास की गाँव के एक जाने पंडीजी एक दिन हमरी गाँव की एक जाने पाणेजी के दही-चुरा पर आमंत्रित कइनीं। हमरी गाँव के पाणेजी दबा के खइनी अउर खा के अघा गइनी। फेन रातिखान भी दबवनी अउर उहवें रातिखान दबा के नींद लेहनी। सबेरे-सबेरे नास्ता में फेन से दही-चुरा मिलल अउर लिट्टी-चोखा लागे लागल। लिट्टी चोखा खइले की बाद हमरी गाँव के पाणेजी ओ पंडीजी से कहनी की भाई तोहार एतना सेवा वेयर्थ ना जाई, चलSदेउरियां। आई हो दादा। पंडी जी अउर पाणेजी देउरियां गइल लोग अउर हमरी इहाँ के पाणेजी दही-चुरा की बदले 110 बिगहा ओ पंडी जी की नावे क देहनी। नावे क देहले की बादो लगभग 25-30 साल ले त उ जमीन हमरी गाँव के लोग जोते-बोवे पर अब ओ जमीन पर दही-चुरा खिआवे वाला पंडी के खानदान सोना बोवता अउर सोनवे काटता। एक मुट्ठी चिउरा अउर जीवन भर सोना उपजावे के साधन।
मिरिच-मसाला मिला के हम अपनी गाँव के लंठई भरल मनोरंजन के कहानी
त सुना देहनीं। ए के कहानी की रूप में लेहले के ताक बा अउर एइसन काम कइले के कत्तई
ताक नइखे जवने से केहू के दुख पहुचों। कवनो काम कइले की पहिले सोंची की अगर इ काम
रउरी साथे होखे त? अगर एकर उत्तर सकारात्मक बा तब त उ काम करीं ना त ना। जय
माई-भाखा।
-पंडित प्रभाकर पांडेय"गोपालपुरिया"
-पंडित प्रभाकर पांडेय"गोपालपुरिया"

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