भस्टाचार
पहिले त अबहिन ले
हम इहे ना समझि पवनी की भस्टाचार का हS? हमरा इयादि बा एक बेर रमेसर काका से पूछले रहनीं की काका, भस्टाचार का ह? त उ बतवले रहने की ऊपरी कमाई। हमरा अजीब लागल, हम कहनी की काका अगर आफिस में 9 से 5 खटले की बाद हम 7 से 9 कुछ अउर काम करतानी
त का इ भस्टाचार हS। रमेसर काका
हँसने अउर कहने की ना रे बुरबक, अगर आफिसे आवर में ते के हू से घुस लेके कवनो काम करतारे त उ
भस्टाचार ह अउर हँ अगर साथे-साथे आफिसे आवर में ते आफिस के काम न क के आपन कुछ काम
करतारे, कहे के मतलब बा की अधिका करतारे त उ
हो भस्टाचार ह।
अच्छा, अब समझ में आइल, ए ही से अधिकारी लोग आपन निजी काम खुदे न क के अपनी सहायकन (चपरासी
आदि) से करवावे ला लोग, जइसे- बैंक में आपन चेक भरवावल, बिजली के बिल, दूधे, पेपरे के बिल आदी
अउर साथे-साथे गरज पड़ले पर आपन तथा अपनी पूरा परिवार, सगे-संबंधी के टिकट आदि निकलवावल, लइका के स्कूले छोड़वावल।
हमरा एयादि बा एक
जाने प्रिंसपल साहब रहने त उनकरी स्कूले के दु गो चपरासी त हरदम उनकी दुअरवे पर
रही के गोबर-गोहथारि करे लोग अउर सेलरी स्कूले से उठावे लोग। खैर पता ना, इ भस्टाचार ह की ना।
अब आईं रऊँसा सब
के एगो किसान, मजदूर की लगे ले के चलतानी, इ देखे खातिर की का इहो लोग भस्टाचार में लिप्त बा लोग आकि इ लोग
जवन करता ओके भस्टाचार ना कहल जाई।
रमई काका एगो
छोट-मोट किसान हउअन। एकदिन उनकरी घरे गइनी त पता चलल की उ गोदामें पर खादि-बिया
लिआवे गइल बाने पर बाद में पता चलल की उ गोदामे पर ना सचिव की घरे गइल रहने ह अउर
दु-चार सौ अधिका दे के रातिए-रात 10-12 बोरा खादि अउर बिया उठा के लिया के भुसउला में ध देले बाने। उनके
कहनाम रहे की के लाइन लगा के खाद-बिया निकाली। एक दिन उ 20-25 हजार रूपया घुस दे के अपनी पतोहा के आँगन-बाड़ी में नोकरी दिउआ
देहने अउर आँगन-बाड़ी की नाव पर सरकार से जवन कुछ भी मिलेला बेंची देने। जब केहू
चेंकिंग करे आवेला (उ इ पहिलहीं पतो क लेने की के आवता) त खिया-पिया दीहें अउर अगर
अधिकारी घुसखोर नइखे त ओई दिन गाँवभरी की लइकन के दुआरी पर जुटिया लीहें अउर उनकर
पतोहा पढ़ावल सुरू क दीहें। एतने ना अउर सुनी, रमई काका की छोटका लइकवा घनेसरा के दसवीं के इंतिहान रहे, जानतानी रमई काका का कइने? अरे उ पाँचि हजार रूपया ले जा के विद्यालय में दे अइने, उनके फकचोन्हर लइका घनेसरा फस क्लास से हाईस्कूल पास क लेहलसि।
एक दिन के बाति ह
कि घुरहू काका की लगे गइनीं अउर कहनी की ए काका, एक दिन आके तनि हमार खोंपवा छा देतS, तोहके तोहार मजदूरी दे देइबि त उ हँसने अउर कहने की ए बाबू काहाँ
समय बा, नरेगा में काम करतानी, उ हो का करेनी की तनि देहिं-ओहीं दोला देनी बस। जवने दिन अधिकारी
आवेला ओही दिने तनि मेहनति करे के परेला बाकि दिन त राम के राज बा। एक दिन हमरा
इहो पता चलल की घुरहू काका अपनी घरवें रहने अउर ओ दिन के मजदूरी भी उनके मिली गइल
पर हाँ एकरा खातिर उनकरा ओही दिन के आपन आधा मजदूरी अपनी ऊपरवाला आदमी के देबे के
परल। खैर कुछु होखो, घुरहू काका त बहुते
खुस रहने।
अब आईं एगो
नाया-ताजा समाचार बतावत बानी। एक दिन बटेसर भाई अइने। तनी नेताटाइप आदमी हँउअन पर
अपना के बहुत पाक-साफ समझेंने अउर गाँधीजी के भक्त हउअन। आवते कहताने की ए बाबू, चलS, दिल्ली चलल जाव।
त हम कहनी की बटेसर भाई कुछ जरूरी काम बा का? त कहने की भस्टाचार हटावे के बा अउर ए से जरूरी काम का होई। चलS, अन्ना हजारे बाबा की सपोट में चले के बा अउर उनकरी अनसन में भाग
लेबे के बा। हम कहनी की भाई हमरी लगे अबहिन पइसा-ओइसा नइखे त उ झट से कहताने की
अरे भाई! पइसा-ओइसा का होई, चलS गाँव से अन्ना
बाबा के सपोट करे खातिर कुछ धान-गोहूँ असूला जाव अउर ओही से आपन खरचा-बरचा आराम से
चलि जाई अउर एकहगो गाँधी टोपी पहिन लेहल जाई। जब टरेने में बिना टिकट रहले पर टीटी
लोग टिकट माँगी त कहल जाई, "बाबा अन्ना, संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।"
हँ अब एगो बाति
क्लियर हो गइल अउर ऊ इ कि भस्टाचार के भी कई गो परकार बा अउर भस्टाचारी लोगन के भी, बस अपना के ओमें से एगो में फिट कइले के ताक बा।
कुछ दिन पहिले हम
एगो लेख लिखले रहनी, ओमें से कुछ लाइन
फेर इहाँ दे तानी।
"हम बदलेंगे, युग बदलेगा।" त पहिले अपनी आप में बदलाव लाईं। केहू पर अंगुरी
उठवले की पहिले अपनी गिरेबाँ में झाँकि के देखीं की रउआँ जवन करतानी उ कहाँ ले सही
बा।
पं. प्रभाकर गोपालपुरिया
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