अनुसासन हS सुसासन के जननी
बचपन में बाबा बार-बार एगो किस्सा सुनावें। एगो बहुत धनिक-मानिक अदमी रहे। ओकर घर धन-धान्य से भरल रहे। घोरसार , हथीसार , गउसाल सब आबाद रहे। ओकरी घर में बहुते अनुसासन रहे। छोट बड़ के मान दे और बड़ छोट के नेह दे। एक बेर उ अदमी अकेले अपनी बगीचा में बइठल रहे। तवलेकहीं एगो मेहरारू उहाँ रोवत आइल। अदमी ओ मेहरारू से ओकरी रोवे के कारन पूछलसि। मेहरारू कहलसि की हम बिपति हईं , हम तोहरी पर पड़े आइल बानी। पर तोहरी घर के अनुसासन , आपस के नेह-दुलार देखि के हमरा रोवाई आवता की एतना नीमन परिवार अब तहस-नहस हो जाई। उ अदमी तनी हँसल अउर कहलसि की ठीक बा। तूँ पड़े आइल बाड़ू त परबे करबू। पर एइसन पड़ S की हमार धन-धान्य बरबाद न होखो। घोड़ा घोरसारे रहि जां , हाथी हथीसाले अउर गाइ गउसाले। ओ अदमी के इ बाति सुनि के उ बिपति कहलसि की फेर त हमार पड़ल का कहाई। फिर उ अदमी कहलसि की ठीक बा तूं अपनी हिसाब से पड़ S पर हमरी घर के अनुसासन पर आपन नजर मति दिह S । बिपति मानी गइल। बिपती की पड़ते उनके सबकुछ बरबाद हो गइल। घर में कुछु ना बचल। घोरा , हाथी , खेत-बारी सबकुछ तहस-नहस हो गइल। घर में एतनो अन्न ना बंचल की एक्को ...