बदलत जा ता गउआँ-दुआर
ऊँखियाड़ी में से एक बोझा गेड़ ले के लवटल रहनी तवलेकहीं रमेसरी काकी मिल गइली। हमके देखते कहतारी की ए बाबू तूँ त फगुआ में कबो घरे ना आवेल S , ए बेरी कई बरीस की बाद आइल बाड़ S । “ का करीं काकी , रोजी-रोटी के सवाल बा , ना त केकरा घर छोड़ी के परदेस में रहे के मोन करी ?” , हमरी एतना कहते काकी कहतारी , “ अच्छा , ठीक बा , झँटीकट्टा में गेड़ धइले की बाद तनी हमरी दुआरे की ओर उपरहिअ S बाबू , कोल्हुआड़ चलता। पीए के कचरसो मिली अउर साथे-साथे गरमागरम महिया। ” झँटीकट्टा में गेड़ धइले की बाद हम भँइसी के नादे पर से उकड़ा के खूँटा पर बाँधि देहनी। ओकरी बाद ओकर ओढ़नी-सोढ़नी ठीक कइले की बाद रमेसरी काकी की दुआरे की ओर चल देहनीं। रमेसरी काकी की दुआरे पर पहुँची के का देखतानी की पिंटुआ गुलवरी झोंकता अउर फगुआ टेरले बा। अपनी आप में ऊ एतना मस्त बा की हमार उहाँ पहुँचल ओकरा बुझइबे ना कइल। हमहीं टोकनी , “ अउर हो , पिंटु लाल ! का होत जाता , खूब फगुआ टेरतार S । ” ए पर पिंटुआ कहता की भइया तोह लोगन की आसिरबाद से सब बढ़िया चलता। अच्छा कइल S ह की ए बेरी फगुआ में घरे...